सुल्तानपुर में तीसरी बार कूड़े में मिली सरकारी दवाएं

11 माह में तीसरी घटना, जांच सिर्फ कागजों तक सीमित

सुल्तानपुर गौड़ की आवाज ब्यूरो जिला के सरकारी दवाओं के कूड़े के ढेर में मिलने का सिलसिला जारी है। पिछले 11 महीनों में यह तीसरी घटना है, जहां सरकारी दवाएं लावारिस हालत में पाई गई हैं। इन मामलों में सीएमओ की जांच अब तक केवल कागजी कार्रवाई तक ही सीमित रही है।ताजा मामला टांडा-बांदा हाइवे पर महेश्वरगंज बड़ी नहर पुल के पास का है। यहां राहगीरों ने पुल के किनारे पटरी पर दवाओं के पैकेट बिखरे देखे। स्थानीय लोगों ने तत्काल इसकी सूचना सीएचसी प्रभारी डॉ. एपी त्रिपाठी को दी।जांच के दौरान पेंटाप्रोजोल, जिंक सहित चार प्रकार की दवाएं मिलीं। इनमें से कई दवाएं एक्सपायर नहीं हुई थीं, जिनमें ब्रूफेन भी शामिल थी। सीएचसी प्रभारी ने सभी दवाओं को अपने कब्जे में लेकर सुरक्षित कर लिया है। विभाग ने इन दवाओं को फेंकने वाले अज्ञात व्यक्तियों की पहचान और इसके पीछे के कारणों की जांच शुरू कर दी है।डॉ. एपी त्रिपाठी ने बताया कि सरकारी दवाओं का इस तरह बाहर फेंका जाना एक गंभीर मामला है। उन्होंने संबंधित विभागों को दवाओं के स्रोत और जिम्मेदार लोगों की पहचान के लिए सूचित कर दिया है। फिलहाल, इस पूरी घटना की छानबीन जारी है।इससे पहले, अगस्त माह में लंभुआ स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) के महिला अस्पताल के सामने एक नाले में सैकड़ों दवाओं के पत्ते तैरते हुए पाए गए थे। स्थानीय समाजसेवी कृष्ण कुमार यादव ने इस घटना का वीडियो और तस्वीरें बनाकर एसडीएम को पत्र लिखा था।उस मामले में भी आज तक यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि ये दवाएं किस प्रकार की थीं और इन्हें क्यों फेंका गया था। नायब तहसीलदार लंभुआ अभय राज पाल ने एसडीएम के निर्देश पर जांच की थी।

सीएमओ भारत भूषण के अनुसार, एसीएमओ ने जांच की औपचारिकता पूरी कर दोषियों को बचाने का प्रयास किया था।जनवरी में भी इसी तरह की घटना सामने आई थी, जहां फेंकी गई दवाओं में एल्बेंडाजोल, अमाक्सीसिलिन और आईसीयूडी कॉपर टी जैसी दवाएं शामिल थीं। इनमें से भी कई दवाएं एक्सपायर नहीं हुई थीं।

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